वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों की व्युत्पत्ति और विकास

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों की व्युत्पत्ति और विकास PPT देखें.

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क्‍या हम अपने आप को सर्वश्रेष्‍ठ भारतीय समझते हैं ? या वि‍देशी चश्‍मे से जो हमें दि‍खाया गया, वही सही समझते हैं ! ‘मस्‍ति‍ष्‍क-मंथन’

जब कभी हमें यह प्रश्‍न पूछा जाता है, तब उसका उत्तर होता हैंहां, क्‍योंकि‍ हमें लार्ड मेकाले ने जो शिक्षा पद्धति‍ दी है, वह हमें वि‍देशी चश्‍मे से सोचना सि‍खाती है। आज से ठीक 139 वर्ष और 5 माह पूर्व दि‍नांक 2 फरवरी, 1835 को ब्रि‍टि‍श संसद में ब्रि‍टेन के जुझारू, संघर्षशील, देशप्रेमी तथा ब्रि‍टेन को सर्वोत्‍कृष्‍ठमानने वाले एक इंसान लॉर्ड मेकाले ने नि‍म्‍न वक्तव्‍य दिया था जो आपके समक्ष प्रस्‍तुत है।

मैंने भारत के ओरछोर का भ्रमण कि‍या है और मैंने एक भी आदमी नहीं पाया जो चोर हो। इस देश में मैंने ऐसी समृद्धि‍, ऐसे सक्षम व्‍यक्ति‍ तथा ऐसी प्रति‍भा देखी है कि‍ मैं नहीं समझता कि‍ इस देश को हम वि‍जि‍त कर लेंगे, जब तक कि‍ हम इसके सांस्‍कृति‍क एवं नैति‍क मेरुदंड को तोड़ न दें। इसीलि‍ए मैं यह प्रस्‍तावि‍त करता हूं कि‍ हम भारत की प्राचीन शि‍क्षा पद्धति‍ को बदल दें क्‍योंकि‍ यदि‍ भारतवासी यह सोचने लगें कि‍ जो वि‍देशी एवं अंग्रेजी हैं, वह उनके आचारवि‍चार से अच्‍छा एवं बेहतर है, तो वे अपना आत्‍मसम्‍मान एवं संस्‍कृति‍ खो देंगे तथा वे एक पराधीन कौम बन जाएंगे, जो हमारी चाहत है।

भारत पर वि‍देशी आक्रमण तो पहले भी होते है, परंतु उनका प्रभाव इतना नहीं पड़ा क्योकि‍ तब भारतीयों ने अपनी भाषा, सभ्‍यता और संस्‍कृति‍ को नहीं छोड़ा था। इसलि‍ए लॉर्ड मेकाले इसकी जड़ तक गया कि‍ पूर्ण रूप से भारतीयों पर कैसे शासन कि‍या जा सकता है। वह भारतीयों को मानसि‍क रूप से भी गुलाम बनाना चाहता था। इसलिए उसने भारतीय संस्‍कृति‍ और भाषाओं पर प्रहार कि‍या। काफी हद तक सफल भी हुआ क्योंकि‍ आज भले ही भारत गुलामी से आजाद हो गया है, परंतु आज भी वह वि‍देशी भाषा का गुलाम बना हुआ है। आखि‍र हमारा राष्‍ट्रीय स्‍वाभि‍मान कहां चला गया है ?

कि‍सी भी देश के नि‍वासी को उसकी भाषा, संस्‍कृति‍, शि‍क्षा, संस्‍कार, नैतिकता पर स्‍वाभि‍मान एवं सात्‍वि‍क गर्व होना ही चाहिये। 139 वर्ष पूर्व भारत का प्रत्‍येक भारतीय ऐसे राष्‍ट्रीय स्‍वाभि‍मान और राष्‍ट्रीय गर्व से ओतप्रोत था। जि‍सकी पुष्‍टि‍ स्‍वयं उपर्युक्त वक्तव्‍य के एकएक शब्‍द में गूंज रही है। आज प्रश्‍न है कि‍ जो प्रति‍बद्धता, चाहत संघर्ष क्षमता ब्रिटि‍श कौम में थी क्‍या आज वो 125 करोड़ भारतायों में है। कुछेक कह सकते हैं, परंतु कुछेक के पास इन प्रश्‍नों का उत्तर है या नहीं, यह वही जानते हैं। आखि‍र लॉर्ड मेकाले में ऐसा क्या था जो हम भारतीयों में नहीं है। हमारे पास सब कुछ सर्वोत्‍कृष्‍ठहै पर हम स्‍वयं से जानबूझ कर अंजान बने हुए हैं।

आज समय की आवश्‍यकता है कि‍ हम सब लॉर्ड मेकाले द्वारा रोपि‍त मानसि‍कता को जड़ों से उखाड़ फेंकें और भारतीयता के महान आदर्शों को आत्मसात करते हुए स्‍वयं को वि‍देशी तत्‍वों के समक्ष दीनहीन व्‍यक्ति‍ न समझें और कहें कि‍ भारत वास्‍तव में वि‍श्‍व में महानतम है।यह कार्य तभी संभव हो पायेगा जब संपूर्ण राष्‍ट्र भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 351 के अनुरूप हिंदी व समस्‍त भारतीय भाषाओं में अपना दैनि‍क कामकाज, चिंतन, आवसी संवाद करेगा तथा उसे अपने कार्य व्‍यवहार में अपनाऐगा तभी हरेक भारतीय हीन भावना के दायरे से मुक्त हो पायेगा।

भारत में कई भाषाएं बोली जाती हैं। कई भारतीयों को केवल हिंदी या अंग्रेजी ही नहीं बल्‍की कई भाषायें आती हैं। वि‍देशी भाषा अर्थात अंग्रेजी भाषा सीखना हमारी वि‍लक्षण बौद्धि‍क क्षमता और विद्वत्ता का प्रतीक है। वि‍देशी भाषा सीखना अथवा उसका ज्ञान होना तो बहुत अच्‍छी बात है परंतु उसे अपने दैनि‍क कार्य व्‍यवहार में लाकर उसके अधीन हो जाना और अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करना सर्वथा अनुचि‍त है। मात्र 4 प्रति‍शत भारतीय ही अंग्रेजी पढ़ सकते हैं, बोल सकते हैं, लि‍ख सकते हैं, लि‍ख सकते हैं। मात्र 2 प्रति‍शत सरकारी कार्यालयों/उपक्रमों/बैंक/बीमा कंपनि‍यों आदि‍ में कार्यरत हैं। शेष 96 प्रति‍शत भारत कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी व द्वारका से ब्रह्मपुत्र तक हिंदी व भारतीय भाषाओं में ही संवाद करता हैं व अपने दैनंदि‍न कार्यकलापों को पूरा करता है। जब सरकारी क्षेत्र इस 96 प्रति‍शत भारत से सीधे जुड़कर राष्‍ट्रीय प्रति‍बद्धताओं को पूरा करेगा, तभी देश सही दि‍शा में अग्रसर होगा तभी सर्वांगीण वि‍कास संभव हो पायेगा, वरना संवाद हीनता की एक गहरी खाई प्रशासन व जनता के मध्‍य स्‍थापि‍त रहेगी, दूरि‍यां बढ़ती ही रहेगी।

उपर्युक्त प्रश्‍नों का उत्तर यदि‍ आपके पास है और आप स्‍वयं को आज और अभी से सर्वोत्‍कृष्‍ठभारतीय मानते हैं, साथ ही भारत की प्रत्‍येक भाषा, वस्‍तु, कार्यप्रणाली को सर्वश्रेष्‍ठ मानते हैं तो आज से ही संकल्‍प करें कि‍ हमारे भीतर से लार्ड मेकाले और ब्रि‍टि‍श कौम की चाहत जड़ों से उखाड़ दी गई है और वह तारतार होकर सुदूर वि‍देश चली गई है। अभी स्‍थि‍ति‍ इतनी जटि‍ल नहीं हुई हैं कि‍ इसको सुधारा न जा सके। बस आवश्‍यकता है एक पहल की। अपनी मानसि‍क सोच को बदलने की। अबअ नि‍र्णय आपको करना है कि‍ वि‍देशी भाषा सर्वश्रेष्‍ठ है कि‍ हिंदी व भारतीय भाषायें सर्वश्रेष्‍ठ हैं या लार्ड मेकाले आज भी हमारी सोच में, भाषा में, अस्‍मि‍ता में यह तथ्‍य मानने को वि‍वश कर रहा है कि‍ जो भी वि‍देशी है, वही सर्वश्रेष्‍ठ है।

हमारे वेदों में ज्ञानवि‍ज्ञान के सभी सूत्र मौजुद हैं लेकि‍न वे सभी सूत्र संस्‍कृत भाषा में होने के कारण हमें उसका ज्ञान नहीं हो पाता है। वि‍देशी अनुसंधानकर्ता जो हमारे देश की संस्‍कृति‍ व ज्ञान एवं वि‍ज्ञान का अध्‍ययन करने आये उन्‍होंने हमारे संस्‍कृत के सूत्रों का अपनी (अंग्रेजी) भाषा में अनुवाद कि‍या और वही सूत्र हमें उनकी भाषा में बतायें इससे हमें लगता हैं कि‍ यह उन्‍होंने ढुंढें हैं, और हमें उन्‍हें विदवान मानते हैं। जब कि‍ हमारे भारत में आर्यभट्ट से लेकर भास्‍कराचार्य ऐसे कि‍तने की संशोधन करने वाले वैज्ञानि‍क हो चुके हैं, जो यह आवि‍ष्‍कार पहले ही कर चुके हैं। लेकि‍न हमें यह सब पता नहीं होने के कारण हम वि‍देशी संशोधको का मानते एवं जानते हैं। गुरूत्‍वाकर्षण शक्ति‍ का सि‍द्वांत हमारे ऋग्‍वेद में पहले से संस्‍कृत सूत्रों के रूप में मौजूद हैं। ऐसे कई सारे उदाहरण हम बता सकते है जि‍सकी खोच करने वाले सबसे पहले भारतीय ही थें। महर्षि‍ कणाद ने सबसे पहले अणु की खोच की थी। अन्‍न के कणों को एकत्र करते हुए उन्‍हें पदार्थ सूक्ष्‍मतम इकाई अणू का वि‍चार आया था। ग्रहों की संख्‍या एवं उनको गुणवि‍शेषणों के बारे में ज्‍योति‍ष में पहले से ही वर्णन कि‍या पाया जाता है। गणि‍तीय सि‍द्धांतों में भी भारत अग्रगण्‍य है। 4 वेद और 6 शास्‍त्रों को रचने वाले महर्षी व्‍यास हमारे भारत में ही हुए हैं, जो कि‍ संपूर्ण वि‍श्‍व को देन हैं।

सुपर कंप्‍यूटर बनाने वाला हमारा भारत देश हैं। विदेशों के वि‍भि‍न्‍न क्षेत्रों में कार्य करने वालों में भारतीयों की संख्‍या 35 से 40 प्रति‍शत हैं। वैद्यकि‍य क्षेत्रों में भी भारतीय आगे हैं। परमाणू एवं आण्‍वि‍की के क्षेत्र में भी भारतीय आगे हैं। कृषि‍ की पैदावार में हमारे भारत की कोई तुलना नहीं हैं । वि‍भि‍न्‍नता में एकता को पि‍रोने वाला भारत देश हैं। आध्‍यात्मि‍क क्षेत्र में साधना करने वाले कई भारतीयों के नाम गि‍नाये जा सकते हैं। जि‍समें स्‍वामी वि‍वेकानंद सर्वश्रेष्‍ठ हैं जि‍नके आध्‍यात्मि‍क ज्ञान का लोहा पूरा वि‍श्‍व मानता है उन्‍हें मनन कि‍या जाता हैं।

लेकि‍न 150 वर्षों की गुलामी के कारण हमारी शक्तिस्‍थानों को हमारे भारत देश के कुछ लोग भूल चुके हैं, इसलिए वि‍देश में बनने वाली वस्‍तुओं एवं अन्‍य को हम सर्वश्रेष्‍ठ समझते हैं। लौर्ड मेंकाले की पेट भरन शि‍क्षा पद्धति‍ के कारण हमारे वि‍द्या का हमें वि‍स्‍मरण हो चुका हैं।

आज भी जब कभी कुछ नया स्‍वीकार करने की बारी आती हैं तो जब तक पश्‍चि‍म से उसका स्‍वीकार नहीं कि‍या जाता तब तक हम उसे नहीं अपनाते हैं। परि‍वर्तन की धारा पश्‍चि‍म से पूरब की तरफ बहती है। लेकि‍न हमें यह नहीं भूलना चाहि‍ए कि‍ सूर्य का अस्‍त भी पश्‍चि‍म में ही होता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में लि‍खे गये सूत्रों का ही प्रात्‍यक्षि‍क आज के आधुनि‍क वि‍ज्ञान में देखने को मि‍लते हैं। गुरूत्‍वाकर्षण शक्ति‍ का सि‍द्धांत हमारे ऋग्‍वेद में पहले से ही लि‍खा हुआ है। पायथागोरस के शोध के सि‍द्धांत भी वेदों मे मौजूद है। आज भी कंप्‍यूटर के लिए यदि‍ कोई भाषा सर्वश्रेष्‍ठ है तो वह संस्कृत ही है।

वि‍देशी चष्‍मे से दि‍खाया गया

हमारे सर्वश्रेष्‍ठ भारतीय होने का प्रमाण

मनुष्‍य की उत्‍पत्ति: प्राय: वि‍ज्ञान की सभी शाखाओं में यह पढाया जाता है कि‍ मनुष्‍य की उत्पत्ति‍ आफ्रि‍का खंड में हुई।

वास्‍तवि‍कता यह हैं कि‍ पृथ्‍वी पर सबसे पहले मनुष्‍य की उत्‍पत्ति‍ मानसरोवर क्षेत्र, अर्थात हि‍मालयी क्षेत्र में सबसे पहले हुई हैं, और वही से वह पूरे वि‍श्‍व में फैला है। इसका मतलब है कि‍ पूरे वि‍श्‍व के लोगों के आदि‍ मातापि‍ता हमारे भारत के ही रहने वाले थे, जो प्राचीन काल में हिमालयीन क्षेत्र में रहते थें। इस दृष्‍टि‍ से देखें तो शि‍व और पार्वती ही आदि‍म मनुष्‍य हैं। मनुष्‍यशब्‍द से स्‍पष्‍ट होता है कि‍ सभी मनुष्‍य मनु की संतान है, अर्थात उन्‍हीं से उत्‍पन्न हुए हैं। संदर्भ: सत्‍यार्थ प्रकाश, दयानंद सरस्‍वती, वैदि‍क वि‍नय, आर्य समाज प्रकाशन देखें।

कि‍सी भी वि‍ज्ञान की शाखा के व्‍यक्‍ति‍ से आप जानने की कोशि‍श करें कि‍ पृथ्‍वी की उत्पत्ति‍ कैसे हुई। इसके लि‍ए वह आपको तीन सि‍द्धांत बताएगा, जो केवल अनुमान मात्र हैं।

भारतीय वैदि‍क साहि‍त्‍य में सूर्य, पृथ्‍वी, चंद्र, एवं अन्‍य ग्रहों की सटीक और स्‍पष्‍ट जानकारी मि‍लती है। ऋग्‍वेद के नासदीय सूक्‍त में मि‍लती है। आर्यभट्ट, वराहमि‍हीर ने अपने सूर्यसि‍द्धांत में स्‍पष्‍ट रूप से वि‍श्‍व उत्‍पत्‍ति‍ की वैज्ञानि‍क परिभाषा को स्‍पष्‍ट कि‍या है।

पाश्‍चात्‍य देशों में पि‍छले तीनचार दशकों में वैज्ञानि‍क जागरूकता के नाम पर नये नये सि‍द्धांतों की रचना की गई। औद्योगि‍क क्रांती ने यंत्रों के नि‍र्माण और स्पर्धा को जनम दिया।

भारत पहले से ही वैज्ञानि‍क सि‍द्धांतों के विदवानों की भूमी कही जाती रही है, जि‍समें भौति‍कवाद के स्‍थान पर दार्शनि‍कता को प्रश्रय मि‍ला औरजि‍ओ और जीने दोके सि‍द्धांत का आदर्श माना गया।

प्रकृति‍ का दोहन करने का संदेश पाश्‍चात्‍य दर्शन सि‍खाता है और प्रकृति‍ को अपना गुलाम बनाने के सपने देखना ही वि‍देशी वि‍चारधारा का मूल है।

भारतीय दर्शनशास्‍त्र कभी भी प्रकृति‍ को अपना गुलाम नहीं बनाना चाहती, बल्‍की प्रकृति‍ की शक्‍ति‍ को स्‍वि‍कार कर उसका संरक्षण करने की पहल ऋषि‍मूनि‍यों द्वारा की जाती हैं। भारत के सभी उत्‍सव और त्‍यौहार प्रकृति‍ की पूजा के साथसाथ वि‍वेकपूर्ण उपयोग सि‍खाते हैं। प्रकृति‍ में होने वाले परि‍वर्तनों के अनुरूप ही सभी त्‍यौहारों का क्रम दि‍खाई देता है।

वि‍देशी चश्‍मे से हमें बताया गया कि‍ भारत में अंग्रेज आने के पहले भारत में कि‍सी भी प्रकार की शैक्षि‍क व्‍यवस्‍था और राजकि‍य व्‍यवस्‍था नहीं थीं। अंग्रेजों ने ही हमें वैज्ञानि‍कता के साथ जि‍ना सि‍खाया इत्‍यादि‍। अंग्रेज न आते तो भारत में न ही रेल आती और न हीं हम वि‍कास करते इसी वि‍चार को पालने वाले लोग आपको मि‍लेंगे।

भारत में अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भी भारत में समृद्ध शैक्षि‍क व्‍यवस्‍था के प्रमाण मि‍लते हैं। राजकि‍य व्‍यवस्‍था के भी प्रमाण मि‍लते हैं। भारत के पृथ्‍वीराज चौहान और शि‍वाजी राजा जैसे शुरवीर राजाओं के शासन के कि‍स्‍से सभी को पता है।

भारत में वि‍ज्ञान और तकनि‍की को ज्ञान नहीं था ऐसा दुष्‍प्रचार बाकायदा शि‍क्षा संस्‍थानों के माध्‍यम से कि‍या गया। जि‍सके कारण नयी पि‍ढ़ी के लोग आज भी अपने आप को असहाय मानते हैं, और पाश्‍चात्‍य देशों में जाने के लि‍ए मजबूर कर दि‍ए जाते हैं। जि‍सके कारण भारत का प्रति‍भा पलायन हो रहा है।

वास्‍तवि‍कता यह हैं, कि‍ हमारे देश में ज्ञान, वि‍ज्ञान और तकनीक और प्रॉद्योगि‍की के बहुतायत उदाहरण दि‍खाई देते हैं। यदि‍ हमारे भारत में कुछ था ही नहीं तो बारबार वि‍देशी आक्रमणकारि‍यों ने हमारे देश पर आक्रमण क्यों कि‍ए। ऐसी कौनसी बात थी जो उन्‍हें आकर्षि‍क करती थी।

आज भी वि‍देशों में हमारे देश के 35-40 प्रति‍शत वैज्ञानि‍क, डॉक्‍टर, संशोधक और वि‍द्वान मौजूद हैं।

भारत में अंग्रेजो द्वारा आर्य और द्रवि‍डों का भेद बनाया गया और बारबार यह सि‍द्ध करने की कोशि‍श की गई कि‍, आर्य इस देश के मूल रहि‍वासी नहीं है।

जबकि‍ अब यह सि‍द्ध होने लगा है कि‍, भारत में आर्य कहीं बाहर से नहीं आए, बल्‍कि आर्य लोग भारत से पूरे वि‍श्‍व में फैले हैं। भाषावि‍ज्ञान के माध्‍यम से इसे समझा जा सकता है। प्राचीन काल की संस्‍कृत भाषा के शब्‍द ही वि‍देशी, लैटीन, फ्रेंच, जर्मन, अंग्रेजी भाषाओं में पाए जाते हैं। वि‍श्‍व की सबसे प्राचीन भाषा संस्‍कृत ही है। आर्य कोर्इ जाति‍ वाचक शब्‍द न होकर, वह गुणवाचक है, जो श्रेष्‍ठ हैं, वही आर्य हैं।

इसके जैसे कई उदाहरण हैं, जि‍न्‍हें बताया जा सकता है। आप भी इस वि‍षय पर मस्‍ति‍ष्‍कमंथनकरें।

राहुल खटे,

उप प्रबंधक (राजभाषा),

स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, हुब्‍बल्‍ली

मोबाइल: 09483081656

E-Mail: rahulkhate@gmail.com

वेबसाइट: http://www.rahulkhate.online

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में ईमेल आयडी और वेब अॅड्रेस

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राहुल खटे,

र्इमेल आयडी : राहुलखटे@डाटामेल.भारत

वेबसाईट: राहुलखटे.भारत

मोबाइल: 09483081656

एक बार कि‍सी व्‍यक्‍ति‍ को मैंने अपना ईमेल एड्रेस दि‍या, उसने उसे गलती से हिंदी देवनागरी में लि‍ख दि‍या। बाद में मैंने उसे अंग्रेजी के रोमन लिपि‍ में लि‍खकर सुधार दि‍या। इस घटना के बाद मेरे मन में एक वि‍चार आया था, कि‍ कि‍तना अच्‍छा होता कि‍ हम अपना र्इमेल आयडी हमारे देश की भाषाओं लि‍खते। इस घटना को हुए कुछ वर्ष बि‍तने के बाद भारत सरकार के डीजि‍टल इंडि‍या मि‍शन के अंतर्गत हिंदी में वेबसाईट बनाना संभव होने की खब़र सुनी, खब़र सुनकर खुशी हुई। लेकि‍न दि‍नों तक पता ही नहीं चला कि‍ यह कैसे संभव हैं। पि‍छले हप्‍ते श्री प्रवीण जैन जी के ट्वीटर अकाउंट उनका हिंदी में लि‍खा हुआ मेल आय डी देखा । मेरी खोज़ शुरू हो गई। हिंदी मेल आयडी के लि‍ए संबंधि‍त एन्‍ड्रॉइड तुरंत डाउनलोड कि‍या, जि‍सका नाम डाटामेल” Datamail है। लिंक https://play.google.com/store/apps/details?id=com.datainfosys.datamail इस ऐप्लि‍केशन के जरि‍ए आप अपनी मातृभाषा में मेल आयडी प्राप्‍त कर सकते हैं। भारतीय भाषा प्रेमि‍यों के लि‍ए यह कि‍सी सौगात से कम नहीं।

वर्तमान में इसे व्‍हॉटस् एैप की तरह केवल एन्‍ड्रॉइड मोबाइल में प्रयोग करने के लि‍ए बनाया गया है, भवि‍ष्‍य में इसे व्‍हॉटस् ऐप की तरह कंम्‍यूटर और लैपटॉप के अनुकुल बनाया गया जा सकता हैं। इसका प्रयोग करने के लि‍ए सबसे पहले आपको अपने एन्‍ड्रॉइड ऐप पर गूगल प्‍ले स्‍टोर में जाकर डाटामेल” Datamail इन शब्‍दों को टाइप करना हैं उसके बाद आपको डाटामेल” Datamail एन्ड्रॉइड का पर्याय उपलब्‍ध होगा। यह ऐप डाउनलोड करने बाद आपको अपना मोबाइल नंबर देना हैं, जि‍सपर आपको सभी मेल प्राप्‍त होगे। डाटामेल अंग्रेजी और अंग्रेजी के अति‍रि‍क्त अन्‍य भारतीय भाषाओं जैसे कि हिंदी, मराठी, कन्‍नड, तमि‍ल, तेलुगू, मल्‍यालम, पंजाबी, बंगाली और गुजराती, उूर्दू में मेल लि‍खने/पढ़ने वाले भारति‍यों के बीच के अंतर को कम करने के लि‍ए अत्‍यंत उपयोगी ऐप है। डाटामेल उपयोगकर्ता अपनी मनपंसद/मातृभाषा में र्इमेल पता उपलब्‍ध कराता है और उसी भाषा में आदानप्रदान किया जा सकता है। इस ऐप को BharatSync Technologies(P) Ltd. वेबसाईट:http://www.bharatsync.com/ इस कंपनी ने वि‍कसि‍त कि‍या है। इस ऐप में भारतीय भाषाओं के युनि‍कोड फॉन्‍ट का प्रयोग कि‍या गया है, जि‍ससे यह कि‍सी भी एन्‍ड्रॉइड मोबाइल में खुल सकें। यह कंपनी मोबाइल प्‍लॅटफॉम्स, प्रोग्रामिंग प्‍लॅटफॉम्स, सीएमएस और सीआरएम, युजर इंटरफेस, डाटाबेसेस, डेवलपमेंट टूल्‍स, मि‍डल वायर, डि‍जाईनिंग, एप्‍लि‍केशन और वेब सर्वर इत्‍यादि‍ सुवि‍धाऐं प्रदान करती हैं।

डाटामेल एन्‍ड्रॉइड ऐप खासकर भारत के पढेलि‍खे लोगों के साथसाथ ग्रामीण क्षेत्रों उन लोगों के लि‍ए भी उपयोगी हैं, जि‍नके लि‍ए अंग्रेजी वि‍देशी भाषा वि‍कास में बाधा बनी हुई है। अधि‍कतर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग मोबाइल आदि‍ तकनीकी उपकरणों का प्रयोग इस लि‍ए नहीं करते हैं क्‍योंकि‍ उन्‍हें अंग्रेजी नहीं आता लेकि‍न डीजीटल इंडि‍या के अभि‍यान के तहत कंप्‍यूटर और मोबाइल की सुवि‍धाऐं भारतीय भाषाओं के माध्‍यम से पहुँचाने के कार्य में सरकार कार्य कर रही हैं।

उसी प्रकार इसे भी कंप्‍यूटर के अनुकुल बनाया जा सकता है। इससे भारतीय भाषाओ के तकनीक और कंप्‍यूटर के क्षेत्र में वि‍कास में गति‍ प्राप्‍त होगी। केवल अंग्रेजी की अनि‍वार्यता के कारण मोबाइल का प्रयोग न कर पाने वाले लोगों के लि‍ए एक कि‍सी डीजीटल उपहार से कम नहीं। भारत सरकार के डीजीटल इंडि‍या के तहत की गई इस पहल के बारे में समाज अधि‍कतर लोगों को जानकार नहीं हैं। जैसे हिंदी में हिंदी@डाटामेल.भारत, मराठी में मराठी@डाटामेल.भारत इत्‍यादि। अपनी मनपसंद नाम का ईमेल आयडी प्राप्‍त करने की सुविधा पूर्णत: मुफ्त है।

इस सेवा में 8 भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी और 3 विदेशी भाषाओं – अरबी, रूसी और चीनी में ईमेल आईडी बनाने की सुविधा है। आने वाले समय में डाटा एक्सचेंज टैक्नोलॉजी की तरफ से 22 भाषाओं में निशुल्क ईमेल सेवा उपलब्ध कराई जाएगी, जिसे डाटामेल के तहत संबंधित प्लेस्टोर के माध्यम से किसी भी एंड्रायड या आईओएस प्रणाली से डाउनलोड किया जा सकेगा।

भारतीय भाषाओं में मेल आयडी और डोमेन नेम प्राप्‍त करने की सुवि‍धा http://www.bharat.in/ इस वेबसाईट से प्राप्‍त की जा सकती हैं। (वेबसाईट पर जाने के लि‍ए लिंक पर ctrl की को दबाकर क्‍लि‍क करें) अब आप भी भारतीय भाषाओ में अपने मनपंसद नाम का ईमेल आय डी के साथसाथ अपनी भारतीय भाषा में वेबसाइट पता प्राप्‍त कर सकते हैं। आप मनपंसद डोमेन नेम.भारत अब हिंदी के साथसाथ अन्‍य कई भारतीय भाषाओ में प्राप्त कर सकते हैं। आप अपनी मातृभाषा में भी अपनी मनपंसद नाम की वेबसाइट बना सकते हैं और उसे प्रकाशित कर सकते हैं। उदाहरण आपको यदि‍ अपने, अपनी संस्‍था के या अपने कि‍सी भी उत्‍पाद या वि‍चार/आयडि‍या के नाम से आसानी से एक वेबसाइट बनानी हैं तो अपने मनपसंद नाम से उसे प्राप्‍त कर सकते हैं। इसके लि‍ए आपको http://www.bharat.in/ इस वेबसाईट पर अपनी वेबसाईट को रजि‍स्‍टर करना होगा और उसके लि‍ए नि‍र्धारि‍त शुक्‍ल का भुगतान करना होगा। .भारत नाम से आप मात्र `24.15 में डोमेन ने रजि‍स्‍टर कर सकते है। हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषा जैसे कि‍ मराठी, कन्‍नड, तमि‍ल, तेलुगू, मल्‍यालम, पंजाबी, बंगाली और गुजराती में भी अपने मनपंसद नाम से साथ .भारत जोड़कर बना सकते हैं (यदि अभी उपलब्ध है तो)। अपने नाम के देवनागरी वर्णों के आगे @डाटामेल.भारत लि‍खकर अपना स्‍वदेशी नाम की साईट बना सकते हैं।

इसके अति‍रि‍क्त आपको यदि‍ कंप्‍यूटर के लि‍ए देवनागरी और मातृभाषा में लि‍खे वर्णों की मेल आयडी प्राप्‍त करनी हो तो, आप http://buy.datainfosys.com/Product/Details?productId=NTbXSjR5YN8%3D इस लिंक पर जाकर अपनी मातृ भाषा मे ईमेल आईडी प्राप्त कर सकते है, जि‍स पेकैज में आपको प्रति माह 5 GB अकांउट स्पेस मिलेगा। जि‍सका मूल्‍य शूल्‍क सहीत प्रति‍ ति‍माह रू.115/- है।

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हिंदी मुफ्त डोमेन .भारत पंजीकृत कराएं ( पंजीकरण के लि‍ए इस लाईन पर दो बार क्‍लि‍क करें)

डोमेन रजिस्टर करने के बाद मुफ्त ब्लॉग गूगल पर बनाएं तथा उसे अपने मुफ्त .भारत डोमेन के साथ जोड़ने के लिए इस प्रकार डीएनएस संपादन कर दें।

इस चित्र में 6 नंबर की जो प्रविष्टि है वह हर ब्लॉग की भिन्न होती है तथा उसे ब्लॉग से ही देखकर करना है। राहुस खटे हिंदी के लिए तकनीकी वैज्ञानिक शोध करते हैं तथा उन्होंने अपना ब्लॉग हिंदी में तैयार कर लिया है इसे देखें तथा उनसे संपर्क कर और भी टिप प्राप्त कर सकते हैं।

हिंदी ब्लॉग राहुल खटे (ब्‍लॉग/साईट पर जाने के लि‍ए इस लाईन पर दो बार क्‍लि‍क करें)

भारत सरकार के डिजिटल इंडिया के तहत यह प्रयास है की तकनीकी विकास गति‍ मि‍ले और हम तकनीक के द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड सकें और ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को यदि तकनीक का लाभ उनतक पहूँच सकें। तकनीक के प्रयोग में भाषा का एक महत्वपूर्ण योगदान होता है, तकनीक कि‍तनी भी अच्‍छी क्‍यों न हो वह यदिं आत जनता तक नहीं पहुँच सकी और आम व्‍यक्‍ति‍ यदि‍ उसका उपयोग नहीं कर सकता तो वह अधूरी ही रहेगी। इन बातों को ध्‍यान में रखकर .भारत डोमेन नेम को लाया गया है, ताकि‍ इसका लाभ जनजन तक पहुँचाया जा सकें।

वर्ड वाइड वेब पर भारतीय भाषाओं के कुल अकाउंट का केवल 0.1 प्रतिशत हैं। दूसरी तरफ 89 प्रतिशत आबादी ऐसी है जो गैर अंग्रेजी भाषी है और जिसे इंटरनेट पर ईमेल के जरिए अंग्रेजी में संवाद करने में हर कदम पर बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ता है। इसीलिए सरकार के डिजिटल इंडिया मिशन और मेक इन इंडिया मिशन को आगे बढ़ाते हुए डाटा एक्सजेन टैक्नोलॉजीस प्राइवेट लिमिटेड ने डाटामेलके नाम से पहली निशुल्क भारतीय ईमेल सेवा की शुरुआत की है।

इस सेवा में देशभर के लोगों को 8 भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी में ईमेल आईडी बनाने की सुविधा होगी। इस तरह भारतीय नागरिकों को अपनी क्षेत्रीय भाषा में ईमेल के जरिए संवाद कायम करने की सुविधा मुहैया कराई जाएगी।

वैश्विक इंटरनेट रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट पहुंच के मामले में भारत दुनिया में 139 वें स्थान पर है, जबकि भाषाई विविधता के मामले में हमारा देश अग्रिम देशों की सूची में शामिल है। इंटरनेट पहुंच के लिहाज से आइसलैंड पहले स्थान पर, संयुक्त अरब अमीरात 12 वें, संयुक्त राज्य अमेरिका 18 वें और जर्मनी 19 वें स्थान पर हैं, जबकि इन देशों में भाषाई विविधता अपेक्षाकत बहुत कम है।

जहां तक मोबाइल ब्रॉडबैंड वहन करने की क्षमता का सवाल है, भारत प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के 12.39 प्रतिशत के साथ अभी 101 वें स्थान पर है और आनेवाले समय में सुधारों तथा दूरसंचार उद्योग में प्रतिस्पर्धा के साथ इसमें और अधिक वृद्धि की उम्मीद है।

डाटामेल जैसी सुवि‍धा और भारतीय भाषाओं डोमेन नेम की सुवि‍धा से नि‍श्‍चि‍त ही भारतीय भाषाओं के कंप्‍यूटर और मोबाइल पर प्रयोग का प्रमाण बढे़गा और इससे देश की सूचना प्रौद्योगि‍की के वि‍कास को भी गति‍ मि‍लेगी।

अब आप पहले समझ लें कि जो डोमेन (इस उदाहरण में पराशर.भारत) आपने एक वर्ष के लिए मुफ्त प्राप्त किया है उसे मुफ्त में ब्लॉगर पर होस्ट करने के लिए क्या करना है। क्रम से समझते हैं।

1. जीमेल के माध्यम से draft.blogger.com पर अपना ब्लॉग खोवें या नया बना लें।

2. उसकी सैटिंग में जाकर देखें

3 वहाँ पर ब्लॉगर का पता होगा जो आपने ही दिया है।

4 यहाँ पर Setup a 3rd party URL for your blog दिया हुआ है जिसके माध्यम से हम मुफ्त लिए गए हिंदी डोमेन को देंगे।

5. इसके लिए हमें अपने लिए गए डोमेन के खाते में जाकर जांच करनी है तथा कुछ नई प्रविष्टियां करनी हैं।

6. हमने A record को ब्लॉगर द्वारा बताई गई आई पी जो क्रमशः

1 216.239.32.21

2 216.239.34.21

3 216.239.36.21

4 216.239.38.21

की नई प्रविष्टियां कर देनी हैं।

पहले से मौजूद 1 नंबर A record को

5 202.157.83.82 प्रविष्टि में बदल देना है। यह हिंदी के डोमेन प्रदाता का रिकार्ड है जो 5 नंबर के रूप में रहेगा। यदि आप सभी न करना चाहें तो भी 1 कर दें इससे भी काम चल सकता है हालांकि निर्देश 4 के हैं जिससे 4 विकल्प अवरोध की स्थिति में रहते हैं।

7 इस प्रकार हमने Cname की प्रविष्टि भी कर दी तथा www के साथ इसे जोड़ दिया। पीले रंग की प्रविष्टि के लिए हमें पुनः ब्लॉगर की साइट पर जाना है तथा वहाँ से यह प्रविष्टि ले कर आनी है।

Blogger entry change के लिए जब प्रयास करते हैं तो लाल रंग का संदेश आता है तथा www ghs.google.com के साथ नीचे एक प्रविष्टि दिखाई देती है जिसे पेस्ट कर डोमेन के डीएनएस रेकार्ड में डालना होता है। इसे ही पीले रंह में ऊपर तथा नीचे दर्शाया गया है। यह हर डोमेन के लिए भिन्न भिन्न होती है।

Yellow entry

8. जैसे ही यह प्रविष्टियां पूरी हो जाती हैं हिंदी का डोमेन ब्लॉगर की पोस्टों को दिखाकर आपकी साइट का काम करता है।

9. कृपया देखें कि ब्लॉगर में www. के आगे हिंदी डोमेन नाम अंग्रेजी के वर्णों से बनाया गया है। लेकिन जैसे ही यह ब्राउजर पर चलाया जाता है डोमेन नेम हिंदी में दि‍खेगा: इस लिंक को कॉपी कर गूगल सर्च में पेस्‍ट कर देख सकते हैं: http://www.xn--i1b1dwa0anb1cds8beboq8pb.xn--h2brj9c

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हिंदी में उपलब्ध विज्ञान, तकनीकी साहित्य और पाठ्यक्रम

राहुल खटे

प्राय: समझा जाता है कि, वि‍ज्ञान और तकनीकी की पढाई केवल अंग्रेजी में ही संभव है। ऐसी धारणा होना स्‍वाभावि‍क भी है क्‍योंकि हमारी शि‍क्षा प्रणाली में यही पढाया जाता है कि वि‍ज्ञान की पढाई केवल अंग्रेजी में ही हो सकती है। वि‍ज्ञान और हिंदी के सभी वि‍द्वान यही बताते हुए पाए जाते हैं कि वि‍ज्ञान की परि‍भाषा केवल अंग्रेजी में ही करना संभव है। बड़ेबड़े पुरस्‍कार प्राप्‍त हिंदी के वि‍द्वान हिंदी का महिमा मंडन करते नहीं थकते, लेकिन जब उनके अपने बच्‍चों को स्‍कूल में दाखि‍ला देने का समय आता है, तो वे अंग्रेजी के स्‍कूलों को ही प्राधान्‍य देते हैं। दूसरी तरफ वि‍ज्ञान के विद्वान जब भी वि‍ज्ञान की बात करेंगे तो उनके जुबान से अंग्रेजी ही हावी रहेगी । एक और तर्क दि‍या जाता है कि विज्ञान का उगम ही पश्‍चि‍म की अंग्रेजी भाषा में हुआ है, इसलि‍ए उसे वि‍ज्ञान केवल अंग्रेजी में ही पढना और पढाना उचि‍त है। इसमें वि‍ज्ञान वि‍षय की पर्याप्‍त मात्रा में सामग्री न होने का भी कुतर्क दि‍या जाता है।

वि‍किपीडि‍या पर प्रकाशि‍त एक लेख के अनुसार हिंदी के 3500 लेखक हैं जो वि‍ज्ञान के वि‍भिन्‍न वि‍षयों पर लि‍खते हैं और ऐसे पुस्‍तकों की संख्‍या 8000 के आसपास जो वि‍ज्ञान के वि‍षयों पर लि‍खी गई हैं। चंद्रकांत राजू की पुस्‍तक क्‍या वि‍ज्ञान का जन्‍म पश्‍चि‍म में हुआ है?” पुस्‍तक में स्‍पष्ट रूप से बताया गया है कि किस प्रकार भारतीय प्राचीन विज्ञान के सूत्र जो पहले संस्‍कृत में थे, किस प्रकार अंग्रेजी और अन्‍य भाषाओं में अनुदीत कर उसे अपने नाम से प्रसारि‍त किया गया है।

अब हम इस वि‍षय पर वि‍चार करेंगे कि भारत में वर्तमान समय क्‍या वि‍ज्ञान की पढाई हिंदी में संभव है और यदि‍ संभव है तो किस कक्षा तक, क्‍योंकि वि‍ज्ञान की पढाई हिंदी में करवाना तो संभव है यह कुछ पालक जानते हुए भी अधि‍कतर पालक अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडि‍यम स्‍कूलों में इसलि‍ए भेजते हैं, क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि जब आगे की पढाई अंग्रेजी में ही करनी है, तो बचपन से ही उन्‍हें अंग्रेजी की आदत क्‍यों न डाल दें। लेकिन पालकों को यह नहीं पता होता कि उनके बच्‍चों यदि‍ बचपन में मातृभाषा और हिंदी में वि‍ज्ञान और गणि‍त जैसे कठीण वि‍षय पढेंगे तो उनकी समझ बढेगी और जटील संकल्‍पनाओं को वे और बेहतर ढंग से समझ पाऐंगे।

लेकिन माध्‍यमि‍क, उच्च और महावि‍द्यालयीन तथा वि‍श्ववि‍द्यालयीन स्‍तर की तकनीकी और विज्ञान की पुस्‍तकें और पढाई हिंदी में उपलब्‍ध है तो फि‍र स्‍कूल और बचपन में ही अंग्रेजी का बोझ लादने की आवश्‍यकता क्या है। बच्चों के बस्‍तें और दि‍माग पर बोझ बढाने से अच्‍छा है उन्‍हें मातृभाषा और हिंदी में लि‍खी गई वि‍ज्ञान की पुस्‍तकें पढवाई जाए, इससे उनकी वि‍ज्ञान संबंधी सोच स्‍पष्‍ट होगी ओर उनके कोमल मन और बुद्धि‍ पर वि‍देशी भाषा का बोझ भी नहीं बढेगा।

माध्यमिक शिक्षा के बाद सारी पढाई अंग्रेजी में होने की वजह से भारतीय वि‍द्यार्थी हीन भावना के शिकार भी होते हैं, साथ में उनकी विज्ञान की कोई सोच विकसित नहीं हो पाती या सीधे शब्दों में कहें तो बच्चे अंग्रेजी से सीधे तौर पर सहज नहीं हो पाते हैं, जिससे कि उनके वि‍चारों में मौलिकता की कमी हो जाती है। माध्यमिक स्तर के बाद विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रोफ़ेशनल कोर्सेस की भाषा हिंदी में होनी चाहिए तभी विज्ञान का सही मायनों में प्रसार होगा। हिंदी में विज्ञान को शैक्षणिक स्तर के साथ साथ रोजगार की भाषा भी बनाना होगा। कहने का मतलब यह है कि अगर कोई छात्र हिंदी माध्यम से विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि की पढाई करें तो उसे बाजार भी सपोर्ट करें जिससे कि उसे नौकरी मिल सके। उसके साथ रोजगार के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकार को इसके लिए एक व्यवस्था विकसित करनी होगी तभी हिंदी विज्ञान की भाषा बन पायेगा। इसी तरह हिंदी में विज्ञान संचार को भी रोजगारपरक बनाते हुए बढ़ावा देना होगा।

इसका एक और फायदा यह है कि महावि‍द्यालयीन और वि‍श्ववि‍द्यालय स्‍तर की पढाई को जो सामान्‍यत: 4 से 5 वर्षेां की होती है, उसे घटाकर 2 से 3 वर्षों का किया जा सकता है और अंग्रेजी समझने में लगने वाले समय और मेहनत से भी बचा जा सकता है। भारत सरकार के राजभाषा नीति‍ को कार्यान्‍वीत करने में भी इससे गति‍ मि‍लेगी क्‍योंकि युवापीढि‍ हिंदी में तकनीकी और वि‍ज्ञान के वि‍षयों को पढेंगे तो उन्‍हें केंद्र सरकार के कार्यालयों में रोजगार प्राप्त करने पर अलग से हिंदी प्रशि‍क्षण योजना के माध्‍यम से प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ की कक्षाओं को चलाने की भी आवश्‍यकता नहीं होगी और उन्‍हें सीधे पारंगतपाठ्यक्रम में प्रवेश दि‍या जा सकता है। इसके अति‍रि‍क्त यदि‍ स्‍नातक और स्‍नातकोत्तर स्‍तर पर कार्यालयीन हिंदी भाषा को अनि‍वार्य तौर पर एक वि‍षय के रूप में लागू किया गया तो इससे भी राजभाषा हिंदी के प्रशि‍क्षण और कार्यान्‍वयन को और भी गति‍ मि‍लेगी।

प्राय: देखा गया है कि सरकारी कार्यालयों में भर्ती होने वाले अधि‍कतर लोग अपने तकनीकी और वि‍ज्ञान के वि‍षयों को अंग्रेजी में पढ़कर आते है, इसलि‍ए उन्‍हें अपना कार्य हिंदी में करने में कठीनाई जाती है, जि‍सके लि‍ए ऐसे कर्मचारि‍यों के लि‍ए अलग से प्रशि‍क्षण कार्यक्रम चलाना पड़ता है, जो सि‍र्फ हिंदी में कार्यालयीन कार्य में प्रवीण बनाने के लि‍ए होता है।

भारत के कुछ राज्‍यों में विज्ञान वि‍षयों को हिंदी में पढने और पढाने से अच्‍छे परि‍णाम सामने आने लगे है। अधि‍कतर स्‍पर्धा परीक्षाओं में अव्वल आने वाले वि‍द्यार्थी हिंदी माध्‍यमों से अच्‍छे अंक प्राप्‍त करते दि‍खाई दे रहे हैं। खासकर जटील वि‍षयों को अपनी भाषा में पढने से वि‍षय को समझने में आसानी होती है।

स्‍कूल के वि‍ज्ञान के साथसाथ माध्‍यमि‍क, उच्‍च माध्‍यमि‍क, महावि‍द्यालयीन, स्‍नातक और स्‍नातकोत्तर के वि‍ज्ञान और तकनीकि संबंधी वि‍षयों की पुस्‍तकें हिंदी में भी उपलब्‍ध है, जि‍सकी जानकारी अधि‍कतर लोगों को नहीं है। जैसे वि‍ज्ञान की सभी शाखाओं, तकनीकी, अभि‍यांत्रि‍की, पॉलि‍टेक्‍नीक, आइटीआइ, सीए, सीएस, सीएमए, कंप्‍यूटर, आयकर(टैक्‍्स), स्‍पर्धा परिक्षाओं की तैयारी से संबंधि‍त पुस्‍तकें, धर्म, वि‍धि‍शास्‍त्र, मेडि‍कल, नर्सिंग, औषध नि‍र्माण (फार्मसी), बी फार्मसी की पुस्‍तकें भी हिंदी में उपलब्‍ध हैं। राजस्‍थान, छत्तीसगढ़, मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बि‍हार, दि‍ल्‍ली, पंजाब, हरि‍याणा आदि‍ राज्‍यों में वि‍ज्ञान वि‍षयों का हिंदी में आसानी से पढाया और समझाया जा सकता है। इससे स्‍पर्धा परीक्षा और अन्‍य परीक्षाओं में भी अव्‍वल स्‍थान प्राप्‍त किया जा सकता है। एमएस सी आयटी जैसे कंप्‍यूटर कोर्सेस में यदि भाषा संबंधी एक अध्‍याय जोड़ दि‍या जाए तो कंप्‍यूटर में प्रशि‍क्षण प्राप्‍त करते समय ही हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करने का प्रशि‍क्षण दि‍या जा सकता है।

वर्तमान समय में प्राथमि‍क, माध्‍यमि‍क, उच्चतर, महावि‍द्यालयीन, स्‍नातकोत्तर, स्‍नातक, वि‍श्ववि‍द्यालय स्‍तर की वि‍भि‍न्न वि‍षयों की पुस्‍तकें हिंदी में उपलब्ध है, जि‍नकी जानकारी हम प्राप्त करेंगे। वि‍ज्ञान शाखा से ग्‍यारहवीं और बारहवीं कक्षाओं के बाद बीएस.सी, बी.कॉम. बी.सीए, इलेक्‍ट्रि‍कल, इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स, इंजि‍नि‍यरिंग, नर्सिंग तथा एलएलबी (वि‍धि‍) की पढाई हिंदी में की जा सकती हैं। लेकिन इसमें एक समस्‍या यह हैं कि जो लोग पहले से ही इन विषयों को अंग्रेजी में पढ़कर कॉलेजों तथा वि‍श्‍ववि‍द्यालयों में पढा रहें हैं, उन्‍हें इन वि‍षयों को पहले हिंदी में पढना होगा तभी वे अपने वि‍द्यार्थिंयों का हिंदी में पढा पाऐंगे। इसके लि‍ए, डी.एड, बी.एड, तथा एम.एड के पाठ्यक्रमों में भी पहले इन विषयों को हिंदी में पढ़ने का पर्याय उपलब्‍ध कराना होगा। इसके लि‍ए भारत सरकार के उच्चशि‍क्षा तथा तकनीकी शि‍क्षा वि‍भाग द्वारा वि‍शेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है। इन सभी परि‍वर्तनों से हमारे देश की वैज्ञानि‍क चेतना में जागृति‍ बढेगी और केवल अंग्रेजी के बोझ के नीचे दबे प्रति‍भाशाली वि‍द्यार्थिंयों के भवि‍ष्‍य को सवॉरने में भी सहायता मि‍लेगी ।

इन वि‍षयों में अर्थशास्‍त्र (Economics), पर्यावरण (Environment), कंप्‍यूटर (Computer), लेखांकण (Accountancy), आयकर (Income Tax), अंकेषण (Audit), वाणि‍ज्‍य (Commerce), प्रबंधन (Management), ग्रामीण वि‍कास (Rural Development), वि‍पणन (Marketing), मानव संसाधन(Human Resource), प्राणी वि‍ज्ञान (Zoology), जीव वि‍ज्ञान (Biology), प्राणीशास्‍त्र (Zoology), प्रति‍रक्षा वि‍ज्ञान (Resistance Science), सूक्ष्‍मजीव शास्‍त्र (Micro-biology), जैव प्रौद्योगि‍की (Bio-Technology), वनस्‍पति‍शास्‍त्र (Botany), पारि‍स्‍थि‍ति‍की पर्यावरण वि‍ज्ञान (Environment Science), अनुप्रयुक्त प्राणीशास्‍त्र(Applied Zoology), जैव सांख्‍यि‍की (Bio-Statics), प्रकाशि‍की (Optics) , सांख्‍यि‍किय और उष्‍मागति‍कि, भौति‍की (Physics), गणि‍त भौति‍की (Mathematics Physics), प्रारंभि‍क क्‍वान्‍टम यांत्रि‍की, स्‍पेक्‍ट्रोस्‍कोर्पी (Spectroscopy), प्रायोगि‍क भौति‍क अवकल समीकरण (Experimental Physics), संख्‍यात्‍मक वि‍ष्‍लेषण (Statistics Analysis), नि‍र्देशांक ज्‍यामि‍ति‍ (Directive Geometry), दीमीव, सदि‍शकलन, सम्‍मि‍श्र वि‍श्‍लेषण, गति‍ वि‍ज्ञान (Speed Science), कार्बनि‍क और अकार्बनि‍क रसायन (Organic and inorganic Chemistry), कार्बनि‍क रसायन विज्ञान(Organic Chemistry), भौति‍क रसायन(Physics Chemistry), प्रायोगि‍क रसायन (Practical Chemistry), शोध पद्धति‍ (Research Methodology), सहकारि‍ता वि‍ज्ञान (Co-Operation Science), प्रायोगि‍क वनस्‍पति‍ कोश (Experimental Botany Dictionary), प्रायोगि‍क वनस्‍पति‍शास्‍त्र (Experimental Botany), भृण विज्ञान (Embryology), आण्‍वि‍क जैवि‍की और जैव प्रौद्योगि‍की (Otomic Biology and Bio Technology), पारि‍स्‍थि‍ति‍की और वनस्‍पति‍विज्ञान (Ecology and Botany), भ्रौणि‍की (Embryology Science), पर्यावरणीय जैवि‍की (Environmental Biology), अनुप्रयुक्त प्राणीशास्‍त्र और व्‍यावहारि‍की(Applied Zoology and Behavior Science), जैव सांख्‍यि‍की(Bio Statics), प्रायोगि‍क प्राणीविज्ञान (Practical Zoology), कॉर्डेटा (Cordeta), नाभि‍किय भौति‍की (Nuclear Physics), ठोस अवस्‍था भौति‍की (Solid State Physics), वि‍द्यूत चुंबकत्‍व (Electric Magnetic), वि‍द्युत चुंबकिकी (Electric Magnetic Science), पर्यावरण अध्‍ययन (Environmental Study), शैवाल, लाइकेन एवं बायोफाइटा (Liken and Biotite), सूक्ष्‍म जैवि‍की (Micro-Biology), प्राणि‍ वि‍वि‍धता एवं जैव वि‍कास (Diversity of animals and evolution), कवक एवं पादप रोग विज्ञान(, परि‍वर्धन जैवि‍की (Developmental Biology), पादक कार्यि‍की और जैव रसायन (Plant Psychology and Bio Chemistry)कोशि‍का वि‍ज्ञान अनुवांशि‍की एवं पादप प्रजनन, पादप शरीर क्रि‍या वि‍ज्ञान और जैव रसायन (Plant Physiology and Bio Chemistry) शैवाल, शैवक एवं ब्रायोफायटा, टेरि‍ओडोफायटा जि‍म्‍नोस्‍पर्म और पेलि‍योबॉटनी (Terodofita, Gymnosperms and Paleobotany), समि‍श्र वि‍श्‍लेषण (Complex Analysis), अमूर्त बीजगणि‍त (Abstract Algebra), अवकलन गणि‍त, समाकलन गणि‍त, रेखीय सि‍द्धांत, वि‍वि‍क्त गणि‍त, इष्‍टमि‍ति‍करण सि‍द्धांत, त्रि‍वि‍म नि‍र्देशांक ज्‍यामि‍ति‍, सांख्‍यि‍किय और उष्‍मागति‍की भौति‍की, इलेक्ट्रानि‍क्‍स एंव ठोस प्रावस्‍था युक्‍ति‍यॉं, द्वि‍मीय नि‍र्देशांक ज्‍यामि‍ति‍, त्रि‍वि‍म नि‍र्देंशांक ज्‍यामि‍ति‍, व्‍यावसायि‍क सांख्‍यि‍की, उद्यमि‍ता और लघु व्‍यापार प्रबंधन, नि‍गमीय और वि‍त्तीय लेखांकण, भारतीय बैंकिंग, वि‍त्तीय व्‍यवस्‍था, व्‍यापारि‍क वि‍धि‍, सामान्‍य प्रबंधन, विपणन प्रबंधन, मानव संसाधन प्रबंधन, उच्चतर प्रबंधन, लेखांकण, व्‍यावसायि‍क वातावरण, वि‍पणन शोध प्रबंध, प्रबंधकिय अर्थशास्‍त्र, वि‍ज्ञापन प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय वि‍पणन, मानव संसाधन प्रबंध, क्रि‍यात्‍मक (प्रयोजनमूलक) प्रबंधन, व्‍यावसायि‍क बजटन, परि‍योजना नि‍योजन एवं बजटरी नि‍यंत्रण, भारत की संवैधानि‍क वि‍धि‍, वि‍धि‍क भाषा इत्‍यादि‍।

बी एस.सी. के लि‍ए उपयोगी प्राणि‍ कार्यि‍की एवं जैव रसायन, प्रति‍रक्षा वि‍ज्ञान, सूक्ष्‍म जीववि‍ज्ञान एवं जैव प्रौद्योगि‍की, प्रायोगि‍त प्राणी विज्ञान, कॉडेटा (संरचना एवं कार्य), पारि‍स्‍थि‍ति‍की एवं पर्यावरण जैवि‍क, बी.एससी पार्ट 3 के लि‍ए अनुप्रयुक्त प्राणीशास्‍त्र, व्‍यावहारि‍की एवं जैवसांख्‍यि‍की, तृतीय वर्ष के लि‍ए प्रायोगि‍क प्राणि‍वि‍ज्ञान, प्रकाशि‍की(भौति‍की) सांख्‍यि‍किय और उष्‍मा गति‍की भौति‍की बी.एस.सी द्वि‍तीय वर्ष के लि‍ए। बी.एससी. (तृतीय वर्ष के लि‍ए) प्रारंभि‍क क्‍वॉटम और स्‍पेक्‍ट्रोस्‍कोपी, वास्‍तवि‍क वि‍श्‍लेषण, अवकलन समीकरण (डि‍फ्रंशि‍यल इक्‍वीशन्‍स), नि‍देशांक ज्‍यामि‍ति‍, द्वीमीव, सदीश कलन, समि‍श्र मि‍श्रण, गति‍ वि‍ज्ञान, कार्बनि‍क और अकार्बनि‍क रसायन, .उपलब्‍ध हैं।

अर्थशास्‍त्र में व्‍यावसायि‍क सांख्‍यि‍की, व्‍यावसायि‍क अर्थशास्‍त्र, समाजशास्‍त्र, मनोवि‍ज्ञान की पुस्‍तकें भी उपलब्‍ध है। अब पॉलि‍टेक्‍नि‍क की पुस्‍तकें के बारे में जानेंगे। पॉलि‍टेक्‍नि‍क के द्वि‍ति‍य और तृतीय वर्ष की पुस्‍तकें: प्रथम वर्ष के लि‍ए बेसि‍क इलेक्‍ट्रानि‍क्स, बेसि‍क इलेक्‍ट्रि‍कल इंजि‍नीयरिंग, इलेक्‍ट्रि‍कल मैनेजमेंट और इन्‍स्ट्रूमेंशन, इलेक्‍ट्रि‍कल सर्किट थ्‍योरी, इनेक्‍ट्रि‍कल मशीन, पावर सि‍स्‍टम, माइक्रो प्रोसेसर और सी प्रोग्रामिंग, इलेक्‍ट्रि‍क वर्कशॉप, स्‍टेंथ ऑफ मटेरि‍यल, फ्यूयि‍ड मैंकेनि‍क्‍स एण्‍ड मशीन, इंजि‍नि‍यरिंग मटेरि‍यल एण्‍ड प्रोसेसिंग, मशीन ड्रार्इंग और कंप्‍यूटर एडेड ड्राफ्टींग, बेसि‍क ऑटोमोबाइल इंजि‍नि‍यरिंग, इलेक्‍ट्रि‍कल इलेक्‍ट्रानि‍क्‍स इंजि‍नयरिंग, थर्मोडायनामि‍क्‍स और अंर्तदहन इंजि‍न, वर्कशॉप टेक्‍नॉलॉजी और मेट्रोलॉजी, सी प्रोग्रामिग, बि‍डिंग टेक्‍नॉलॉजी, सर्वेयिंग, ट्रान्‍सपोर्ट इंजि‍नि‍यरिंग, सॉईल फाउंडेशन इंजि‍नि‍यरिंग, कॉन्‍क्रि‍ट टेक्‍नोलॉजी, बि‍ल्‍डिंग ड्रार्इंग इत्‍यादि‍।

इलेक्ट्रीकल और इलेक्ट्रानि‍क्स इंजि‍नि‍यरिंग की पुस्‍तकें भी हिंदी में उपलब्‍ध हैं बेसि‍क इलेक्ट्रॉनि‍क्स, बेसि‍क मैकेनि‍कल इंजीनि‍यरिंग, बेसि‍क इलेक्ट्रि‍कल इंजि‍नीयरिंग, इलेक्‍ट्रि‍कल प्रबंधन (मैंनेजमेंट) एण्‍ड इंस्‍टूमेंटेशन, इलेक्ट्रि‍कल सर्किट थ्‍योरी, इलेक्‍ट्रि‍कल मशीन, पावर सि‍स्‍टम, माइक्रो प्रोसेसर और सी प्रोग्रामिंग, इलेक्‍्ट्रि‍कल वर्कशॉप, इंटर प्रोन्‍यूरशि‍प एण्‍ड मैनेजमेंट, प्रशासनि‍क वि‍धि। इन पुस्‍तकों के माध्‍यम से आसानी से इलेक्‍ट्रि‍कल इंजि‍नि‍यरिंग की पढाई पूरी की जा सकती है।

सामान्‍य अर्थशास्‍त्र, लेखांकण के मूल तत्व, परि‍णामात्‍मक अभि‍रूचि‍, व्‍यापारि‍क वि‍धि‍, व्‍यापारि‍क वि‍धि‍, नीति‍शास्‍त्र और संरचना, व्‍यापारि‍क वि‍धि‍, नीति‍शास्‍त्र और संचार, अंकेषण और आश्‍वासन इत्‍यादि‍ पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं, जिन्‍हें राजस्थान वि‍श्‍ववि‍द्यालय में समावि‍ष्‍ट किया गया है।

प्राय: देखा जाता है कि वि‍धि‍ संबंधी पुस्‍तकें हिंदी में न मि‍लने के कारण हमारी न्‍यायव्‍यवस्‍था से आवाज उठती है कि हिंदी को न्‍यायालयों में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। लेकिन हिंदी में भी एलएलबी की पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं, जो इस प्रकार हैंवि‍धि‍शास्‍त्र एवं वि‍धि‍ के सि‍द्धांत, अपराध वि‍धि‍, संपत्ती अंतरण अधि‍नि‍यम एवं सुखाधि‍कार, कंपनी वि‍धि‍, अंतर्राष्‍ट्रीय वि‍धि‍ और मानवाधि‍कार, श्रम कानून (वि‍धि‍), प्रशासनि‍क वि‍धि‍, आयकर अधि‍नि‍यम, बीमा वि‍धि‍ इत्‍यादि‍ जि‍नकी सहायता से वि‍द्यार्थी हिंदी में कानून की पढाई की जा सकती है। इससे आगे चलकर यहि‍ लोग न्‍यायालयों में हिंदी में अपनी बात रख सकते हैं। इसमें संवि‍दा वि‍धि‍, दुष्‍कति‍ वि‍धि‍ (मोटर वाहन अधि‍नि‍यम और उपभोक्ता), हिंदु(लॉ) वि‍धि‍, मुस्‍लि‍म (लॉ) वि‍धि‍, भारत का संवैधानि‍क वि‍धि‍, वि‍धि‍क भाषा लेखन और सामान्‍य अंग्रेजी, भारत का वि‍धि‍क और संवैधानि‍क इति‍हास, लोकहि‍त वाद और वि‍धि‍क सहायता और पैरा लीगल सर्वि‍सेस इत्‍यादि।

इसके अति‍रि‍क्‍त कृषि‍ वि‍ज्ञान और पशुचि‍कित्‍सा जैसे वि‍षयों को हिंदी में पढाने से भी उसका सीधा फायदा पाठकों को होगा क्‍योकि यह दोनों वि‍षय देश की मि‍ट्टी से जुड़े हैं। कृषि‍ वि‍ज्ञान को हिंदी में पढाये जाने से देश की कृषि‍ व्‍यवस्‍था को इसका लाभ ही होगा। जि‍सकी पूस्‍तकें भी हिंदी में उपलब्‍ध है। कंप्‍यूटर की पढाई में सीप्रोग्रामिंग, इलेक्ट्रॉनि‍क्‍स और शॉप प्रक्‍टि‍स, सर्किट एनॅलीसि‍स, इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स मेजरमेंट एण्‍ड इन्‍स्‍ट्रुमेंटेशन, इलेक्‍ट्रॉनि‍क डि‍वाईसेस एवं सर्किटस्, डि‍जीटल इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स, वेब प्रोपोगेशन एवं कम्‍यूनि‍केशन इंजि‍नि‍यरिंग, इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स इन्‍स्‍ट्रुमेंटेशन, आदि‍ तकनीकी वि‍षयों का समावेश है।

भारत सरकार के केंद्रीय वि‍श्‍ववि‍द्यालय जैसे महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी वि‍श्‍ववि‍द्यालय, वर्धा और अटल बि‍हारी वाजपेयी वि‍श्‍ववि‍द्यालय, भोपाल ने ऐसे कुछ पाठ्यक्रमों को हिंदी में पढाने का शुभारंभ भी किया है, जि‍समें प्रबंधन, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, कम्प्यूटर साइंस, हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, मनोविज्ञान, मीडिया, फिल्म अध्ययन, भौतिकी, गणित, सूचनाप्रौद्योगिकी एवं भाषाअभियांत्रिकी आदि‍ वि‍षय सम्‍मि‍लि‍त हैं। इसके अति‍रि‍क्‍त भाषा संबंधी कुठ पाठ्यक्रमों का भी समावेश है, जैसें पीएच.डी. स्पेनिश, एम.फिल. (कंम्‍प्‍यूटेशनल लिंग्विस्टिक्‍स), एम.फिल (कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान), अनुषंगी अनुशासन: अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान कंप्यूटर साइंस, इनफॉरर्मेशन टेक्नोलॉजी, भौतिक विज्ञान, गणित का भी समावेश हैं। इनसे कई रोजगार के अवसर भी उपलब्‍ध होते हैं जैसे कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान के विद्यार्थी देश विदेश के विभिन्न संस्थानों में, विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर एवं शोध अनुषंगी (रिसर्च एसोशिएट) विभिन्न प्रौद्योगिकी संस्थानों जैसेआई.आई.टी.,आई.आई.आई.टी अथवा विभिन्न शोध संस्थान जैसे सीडैक अथवा विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भाषा संसाधन विशेषज्ञ या कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञानी के रूप में नियुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। देशविदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी शोध एवं अध्यापन के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। इसके अति‍रि‍क्‍त एम. फिल. चायनीज़, एम. फिल. स्‍पेनिश, एम.फिल. हिंदी (भाषा प्रौद्योगिकी), एम.. कंप्‍यूटेशनल लिंग्विस्टिक्‍स पाठ्यक्रमों से भी रोजगार के द्वार खुल गए हैं, जिसके अंतर्गत कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स के सैद्धांतिक एवं अनुप्रयुक्त क्षेत्र यथाकम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा, प्राकृतिक भाषा संसाधन आदि का अध्ययन किया जाता है।मास्‍टर ऑफ इन्‍फॉरमेटिक्‍स एन्‍ड लैंग्‍वेज इंजीनियरिंग इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत भाषा से जुड़े सूचना एवं अभियांत्रिकी क्षेत्र का अध्ययन किया जाता है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में हिंदी भाषा को लेकर नई अवधारणा का विकास करना है। इस पाठ्यक्रम में भाषाअभियांत्रिकी एवं सूचनाप्रौद्योगिकी से संबद्ध विविध प्रयोगात्मक क्षेत्रों के अध्ययन पर बल दिया जाता है।कम्‍प्‍यूटर अप्लीकेशन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (भाषा प्रौद्योगिकी) भाषा प्रौद्योगिकीय अध्ययन विकास एवं शोध के लिए बौद्धिक संसाधनों का उत्पादन एवं प्रशिक्षण प्रदान करना हैं। इसके अति‍रक चीनी भाषा में एडवांस्‍ड डिप्‍लोमा डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं। यह एकीकृत पाठ्यक्रम है, जो दो वर्षीय पाठ्यक्रम है, जो चार छमाही में पूर्ण होता है। स्‍पेनिश भाषा में डिप्‍लोमा, यह एक वर्षीय पाठ्यक्रम है, जो दो छमाही में पूर्ण होता है। स्‍पेनिश भाषा में एडवांस्‍ड डिप्‍लोमा, यह दो वर्षीय पाठ्यक्रम है, जो चार छमाही में पूर्ण होता है। जापानी भाषा में डिप्‍लोमा यह एक वर्षीय पाठ्यक्रम है, जो दो छमाही में पूर्ण होता है। मलयालम भाषा में डिप्‍लोमा, उर्दू भाषा में डिप्‍लोमा, डिप्‍लोमा इन कम्‍प्‍यूटर एप्‍लीकेशन, यह एक वर्षीय अंशकालिक पाठ्यक्रम है, जो दो छमाही में पूर्ण होता है। फ्रेंच भाषा में डिप्‍लोमा, यह एक वर्षीय पाठ्यक्रम है, जो दो छमाही में पूर्ण होता है। इसके अति‍रि‍क्त संस्कृत भाषा में डिप्लोमा, स्‍पेनिश भाषा में सर्टिफिकेट, चीनी भाषा में सर्टिफिकेट, फ्रेंच भाषा में सर्टिफिकेट पाठ़यक्रम, जापानी भाषा में सर्टिफिकेट, बांग्‍ला भाषियों के लिए सरल हिंदी शिक्षण में सर्टिफिकेट इत्‍यादि‍ पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं।

ज्ञानविज्ञान के सभी क्षेत्रों में शिक्षण, प्रशिक्षण एवं शोध को हिन्दी माध्यम से बढ़ाने हेतु 19 दिसंबर 2011 को मध्यप्रदेश शासन ने अटल बि‍हारी वाजपेयी हिंदी वि‍श्‍ववि‍द्यालय, भोपाल की स्थापना की है। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना है जो समग्र व्यक्तित्व विकास के साथ रोजगार कौशल हिंदी माध्‍यम से करना है। विश्वविद्यालय ऐसी शैक्षिक व्यवस्था का सृजन करना चाहता है, जो भारतीय ज्ञान तथा आधुनिक ज्ञान में समन्वय करते हुए छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों में ऐसी सोच विकसित कर सके जो भारत केन्द्रित होकर सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण को प्राथमिकता दे। इस विश्वविद्यालय का शिलान्यास 6 जून 2013 को भारत के राष्ट्रपति माननीय श्री प्रणव मुखर्जी के कर कमलों से ग्राम मुगालिया कोट की 50 एकड़ भूमि पर किया गया है। इस वि‍श्‍ववि‍द्यालय में18 संकायों में 200 से अधिक पाठयक्रमों का हिन्दी में निर्माण कर लिया गया है। विश्वविद्यालय में प्रत्येक छात्र को हिंदी भाषा के साथ साथ एक विदेशी भाषा, एक प्रांतीय भाषा के साथ साथ संगणक प्रशिक्षण की सुविधा अंशकालीन प्रमाणपत्र कार्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध हैं। सभी पाठयक्रमों में आधुनिक ज्ञान के साथ उस विषय में भारतीय योगदान की जानकारी भी दी जाती है तथा संबंधित विषय में मूल्य आधारित व्यावसायिकता के साथ स्वरोजगार की अवधारणा के संवर्धन पर ज़ोर दिया जाता है। अटल बि‍हारी वाजपेयी हिंदी वि‍श्‍ववि‍द्यायल, भोपाल में चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विधि, कृषि, प्रबंधन आदि में हिंदी माध्यम से शिक्षणप्रशिक्षण एवं शोध का कार्य कर रहा हैं। अधि‍क जानकारी के लि‍ए वेबसाइट देखें।

संत गाडगेबाबा अमरावती वि‍श्‍ववि‍द्यालय, अमरावती महाराष्‍ट्र में भी एम एम (अनुवाद हिंदी) यह पाठयक्रम चलाया जाता हैं, जि‍समें हिंदी साहि‍त्‍य के साथसाथ हिंदी भाषावि‍ज्ञान, कोशवि‍ज्ञान, पत्रकारि‍ता, राजभाषा अधि‍नि‍यम, अनुवाद के सि‍द्धांत, हिंदी साहि‍त्‍य का इति‍हास आदि‍ वि‍षय पढाए जाते हैं।

आधार/वेबसाईट:

हिंदी और भारतीय भाषाओं में तकनीक का योगदान

राहुल खटे

वेबसाईट: http://www.rahulkhate.online

आज का युग तकनीक का है, जिसे टेक्नोयुगभी कह सकते हैं, इसलिए आपने देखा होगा कि हम प्रत्येक काम में टेक्नोलॉजी का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के तौर पर पहले जैसा आजकल कोई भी 25 पैसों वाला पोस्ट कार्ड या 75 पैसों वाला अंतर्देशीय पत्र खरीद कर लिखने की बजाय हम मोबाइल एसएमएस या ईमेल टाइप कर चुटकियों में अपना काम निपटाने में माहिर हो गए हैं। बच्चे भी आजकल अपनी पढ़ाई लर्निंग और क्लासेस के माध्यम से पूरी करने लगे हैं, कुल मिला कर देखें तो हम अब टेक्निकली स्मार्ट बन गए है या कुछ इस रास्ते पर चल रहे हैं। और इन सब में हमारी नई पीढ़ी हमसे और तेजी से दौड़ रही है।

अब इसी तकनीक को थोड़ा भाषा के साथ जोड़कर देखते हैं। आज कल सभी कंप्यूटर टाइपिंग आसानी से कर लेते है, जैसे ई मेल भेजना, खोलना आदि। मुझे याद है जब सबसे पहले मैंने कंप्यूटर पर अपना नाम टाइप करके देखा था तब मैंने अंग्रेजी में ही किया था, क्योंकि हिंदी या मराठी में यह सुविधा उपलब्ध होगी ही नहीं यह मानकर हमने कंप्यूटर और मोबाइल पर अंग्रेजी कीबोर्ड को देखकर अंग्रेजी में काम करना शुरू किया था, लेकिन जैसेजैसे आगे बढ़ते गए वैसे वैसे तकनीकी की नई बातें पता चलती गई। वर्ष 2007 में जब मैंने खादी और ग्रामोद्योग के चंडीगढ़ स्थित कार्यालय में कनिष्ठ हिंदी अनुवादक के रूप में काम करना शुरू किया तब सबसे पहले मैंने हिंदी में कंप्यूटर पर काम करने का अभ्यास शुरू किया। इसके पहले मैंने टाइप राईटर पर 25 शब्द प्रति मिनट की मराठी भाषा की टायपिंग की परीक्षा पास भी की थी। आगे जब मुंबई के मुख्यालय में मेरा स्थानांतरण हुआ तब वर्ष 2010 में सबसे पहले यह पता चला की हिंदी(देवनागरी) के फॉन्ट दो प्रकार के होते हैंयूनिकोड और नॉनयूनिकोड। इसके बाद मुझे माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैग्वेज इनपुट टूलके बारे में पता चला जो विंडोज एक्सपी और वि‍डोंज7 में चलते थें। बाद में बैंक में पोस्टिंग मिलने पर कंप्यूटर पर अनिवार्य तौर से यूनिकोड में काम करना शुरू किया। इसके बाद कंप्यूटर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में काम कैसे करें इसपर मुझे अधिक जानकारी मिलनी शुरू हुई। माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैंग्वेज इनपुट टूल की सहायता से वह व्यक्ति भी हिंदी और अन्य भारतीय भधाओं में आसानी से काम कर लेता है। यह टूल सभी एप्लिकेशन पर सफलता से कार्य करता हैं, और अंग्रेजी कीबोर्ड के उपयोग के कारण यह प्रयोग करने में भी सरल है। इसके बाद गूगल हिंदी इनपुट जो अंग्रेजी कीबोर्ड की सहायता से चलता हैं के बारे में पता चला। फिर इन् स्‍क्रीप्ट और बराह आदि की जानकारी से कंप्यूटर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध विविध भाषा सुविधा के बारे में पता चला।

हिंदी भाषा की वि‍शेषता यह हैं कि‍ यह एम सर्वसमावेशी भाषा हैं, इसमें संस्‍कृत से लेकर भारत की प्रांतीय भाषाओं के साथसाथ अंग्रेजी जैसी वि‍देशी भाषाओं के शब्‍दों का अपने अंदर समा लेने की क्षमता हैं। तकनीकी के इस युग में हिंदी ने भी अपने परंपरागत रूप को समय के अनुरूप ढाल लि‍या है। कंप्‍यूटर के साथ हिंदी भाषा ने अपना चोलीदामन का साथ बना लि‍या हैं आज तकनीक के प्रत्‍येक क्षेत्र में हिंदी को अपनाना आसान हो गया हैं। टायपिंग की सुवि‍धा से लेकर वॉइस टायपिंग की सभी सुवि‍धाऐं आज उपलब्‍ध है। आवश्‍यकता केवल इस नवीनतम तकनीक को हिंदी भाषा के उपयोगकर्ताओं को अपनाने की हैं। ओसीआर अर्थात ऑप्‍टीकल कैरेक्‍टर रेक्‍गीशन अर्थात प्रकाश द्वारा वर्णों की पहचान कर पूराने देवनागरी हिंदी टेक्‍स को युनि‍कोड फॉंन्‍ट में परि‍वर्ति‍त करने की सुवि‍धा से पूरानी कि‍ताबों का डि‍जीटलाइजेशन करने में सहायता हो रही हैं, इससे संस्‍कृत भाषा में लि‍खे गये लेख सामग्री को आसानी से हिंदी के युनि‍कोड फॉन्‍ट में परि‍वर्ति‍त कि‍या जा सकता हैं। इससे पूराने शास्‍त्र, ग्रंथों के डि‍जीटलाइजेशन से ज्ञान के संवर्धन में भी दि‍शा मि‍ल रही हैं। प्राचीन ग्रंथों की दूर्लभ प्रति‍यों का डि‍जीटलाइजेशन करने से उसमें उपलब्‍ध ज्ञान का फायदा सभी हो होगा।

भारत सरकार ने हिंदी में वि‍ज्ञान तथा तकनीकी साहि‍त्‍य और शब्‍दावलि‍यॉं उपलब्‍ध हो इसलि‍ए वैज्ञानि‍क एवं तकनीकी शब्‍दावली आयोग की स्‍थापना की हैं जि‍सका कार्य ज्ञानवि‍ज्ञान तथा तकनीकी क्षेत्रों में प्रयोग में आने वाले शब्‍दों का हिंदी पर्याय उपलब्‍ध कराने वाले शब्‍दकोशों का नि‍र्माण करना है। यह आयोग ज्ञानविज्ञान की लगभग सभी शाखाओं से संबंधि‍त शब्‍दावलि‍यों का नि‍र्माण करती है। यह आयोग हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दावली के वि‍कास और समन्‍वय से संबंधि‍त सि‍द्धांतों का वर्णन और कार्यान्वयन का कार्य करता है। राज्‍यों में वि‍ज्ञान की वि‍वि‍ध शाखाओं के द्वारा वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दावली के क्षेत्र में कि‍ए गये कार्य का राज्य सरकारों से सहमति‍ से उनके अनुरोध पर शब्‍दावलि‍यों को अनुमोदन भी प्रदान करती है। आयोग द्वा तैयार की गई शब्‍दावलि‍यों का आधार लेकर वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों की मानक पुस्‍तकों और वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दकोशों का नि‍र्माण करना और उसका प्रकाशन करने करने का कार्य वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दावली आयोग करता है। साथ उत्‍कृष्‍ठ गुणवत्‍ता की पुस्‍तकों का अनुवाद भी कि‍या जाता हैं।

राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढाने में ऑनलाइन हिंदी पुस्तकों को पढने की सुविधा जैसे गूगल बूक्स और कींडल बूक्स आदि‍ ऑनलाईन सुवि‍धाओं की सहायता से आप अपनी पुस्‍तक के कुछ अंश मुफ्त में अथवा पैसों का भुगतान कर अपने मोबाईल पर ही पढ़ सकते हैं। गूगल बूक्‍स पर आप अपनी मनपंसद पुस्‍तक के कुछ अंश पढ़ सकते हैं। इन पुस्‍तकों को आप कंप्‍यूटर लैपटॉप पर गूगल डाउनलोडर की सहायता से पीडीएफ फाईल में डाउनलोड करके रख सकते हैं, उन्‍हें बाद में पीडीएफ फाईल में पढ भी सकते हैं। गूगल वॉइस सर्वि‍स की सहायता से आप बोलकर टाइप होने वाली सुवि‍धा से पाठ को पढकर टाइप करवा सकते हैं। इस सुवि‍धा से हिंदी टायपिंग के लि‍ए लगने वाले समय में बचत होती है। एन्ड्रॉइड मोबाइल पर हिंदी की ऑफलाइन शब्दावली का प्रयोग की सुवि‍धा से अंग्रेजी और अन्‍य वि‍देशी भाषाओं के शब्‍दों के हिंदी शब्‍दार्थ ढूँढने में भी सहायता मि‍लती हैं। इससे हिंदी के तकनीकी वि‍कास को और भी गति‍ मि‍लेगी।

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SCIENCE OF DASHAVATARAS

SCIENCE OF DASHAVATARAS

Rahul Khate

(An Original article is written in Hindi, this is translation of ‘Dashavataron ki Vaigyanikata‘ written by Rahul Khate)

In mythology, the legend of our 18 Dashavataras comes. But the read-educated people believe it fictional. It is not their fault, because people tend to glorify these ten incarnations, they do not indicate that ten incarnation when it was and what its scientific basis.

Let’s try to understand it from a scientific vision. For this lets tally this mythology with modern biology and will resort.

According to the Vishnu Purana and other Puranas the first period dashavtar Forms and Fish (Fish (Matsya)). Now that there is the study of modern biology and geography lesson in what it says about it. Geography lesson / Biology from the sun Earth 4 billion years ago today was different. Initially the earth like the sun was a ball of fire. Dire-Dire and it began to be cold today Tkribn 2 billion years ago, the origin of water on Earth. Scientific organizations from the water is generated by the fire. Water is the chemical formula – H2O, i.e. the water Atoms (Anu) and air (oxygen) from the two Atoms (Anu) water is ready. We still have to heat when it is separated from the steam and the fire is different and it is destroyed, that is to change your appearance. Water on the Earth first formed, the first living creatures in the water that the fish will be born addicted creatures. The first embodiment is that it is – Fish (Matsya)). That is the point of origin of the first fish hooked organisms fully fits on scientific grounds. Obviously, this is not any Non-Scientific (Avagyanik)

The second embodiment-the Kutch avatar. As there was enough water on earth and it began to separate from the land will be the origin of the organisms which live on both water and land with a potential of being / creature today. The turtle is a creature which are amphibians. Amphibian creatures that they have the ability to live life on both water and land. Tortoise on both water and land are capable of living. Therefore another embodiment of Kutch avatar sits perfectly on scientific grounds.

Third embodiment: the boar incarnation. As well as water and land began to be different and special abilities biological life (Jivsrishti) also started developing organism which can live only on the ground today, started their origin. Ie pig animal species such as the boar. Pigs can live solely on the ground. This embodiment is therefore also true of scientific vision and continued further in the development of organisms.

The fourth incarnation of Lord Narasimha Forms. Which animal (lion) and is a mixture of man. Geography was a time when the only anthropomorphic and animal-like beings to be human today. Narasimha incarnation of the same category were also important in the development of a human leg today. When human beings continue to be a long way to go in development. So it is the embodiment of perfection and sits perfectly on scientific grounds.

The fifth incarnation – of dwarf Btu Vaman. When a person is born he is a child in the child becomes gradually growing smaller. His stature is smaller than that of the elders Batu (small) occurs. Batu dwarf the donation had taken everything away from Bali that destroyed his pride. Later in his continued development.

Parasurama, the sixth incarnation Forms. There was a time in India when all the people fighting among themselves only stayed for a week-Bhidnen only. Like other Animal (Pshu). So Parasurama also armed and aggressive nature are perfect, the earth How often free Kshatriya said. Hitting it off aggression and is integral to the development of human life. So it seems fitting that the embodiment of the scientific vision. There was further growth.

Seventh embodiment: the Dasharthputra Rama. Rama had human history and is considered an important, because many of Rama has contributed to humanity in policy setting values. Today, thousands of Ram Sethu and other evidence proved that RAM is happening in India about 9100 years ago from today! We have been. Isapurw ie 7100 years ago. Which is a testament to the millions. Rama’s order and also accelerate the development of human life not only rise above materialism Blkin taught to live the life of human values, human development by establishing the Gtii. A fully scientific truth seems to be on the ground.

Krishna is eighth incarnation. Krishna today almost 5200 years ago, who, along with the establishment of human values ​​and ethics taught political Davpechon and synergy between both installed. Even at Dwarka, Gujarat (Kutch) is in close proximity to the sea. That human history is a crucial leg, which also confirms the theory of evolution.

Forms ninth incarnation of Lord Gautam Buddh. Lord Buddha’s message of peace to the world through non-violence. Step one is important in evolution and Lord Buddha. This conceptual development in the history of humanity not only in the physical counts.

Forms tenth avatar Kalki Avatar. The travel of progress (Vicasyatra) it going on. Which will bring together all human life and for the work and development of the entire human race to a full stop, will travel. Man (Manush) of their lives will also introduce real aim.

Darwinian evolution properly read, then said about the evolution of humans from monkeys to some extent he is right, because the monkey and the man appears quite Similarities. If we assume that a rise of just before the birth of man, it can only be a monkey. Monkeys in the anatomy of the human anatomy and the equity is found. Intellectual development and anatomy are some developments since the monkey man the some are appropriate same for him. Rid of the human body where the bone is still as monkeys have tails. Cunt behind the tail of man in this journey of development.

According to mythology, the lives of 84 million people receive after birth are investigating to see if this scientific organizations from the 21 illegitimate goal, goal Hatchery 21, 21 and 21 goal, goal Udbhij Aquatic organisms, the species (Yonia) stated. If you see a vision of biology on Earth are all species that it is available today. Some of the numbers have declined. But their fossils are still present in water and soil. Human beings in the womb lives every day, if it were split in seconds, it comes almost 8.4 million. We assume that the nature give us all fruits, flowers and other organisms serve receiving, because we have never been all that, then we have a chance to see all this nature. Your idea, assigning.